नन्ही परी सी बिटिया मेरी
फिर से जी उठी आंगन की मिट्टी मेरी।
तुम्हें देख देख मेरा मन,
पुलकित होता प्रतिक्षण ।
तुम्हारी क्रीड़ा न जाने
किस ओर बढ़ी,
जिस ओर चली बिटिया मेरी ।
नन्ही परी सी बिटिया मेरी ।।

तुम्हारी मुस्कान ने मानों
मेरा जीवन फिर से सजाया है।
जैसे तारों ने आसमान को जगमग बनाया है,
वैसे ही तुमने मुझे फिर से जीना सिखाया है ।
नन्ही परी सी बिटिया मेरी ।।

जब तुमने पहली बार मिठी तान भरी,
ऐसा लगा कानों में मेरी मिसरी घुली ।
जीवन का मेरे आधार बनी,
ऐसा लगा तुम ही श्रृंगार बनी,
अब तो तुम ही मेरा संसार बनी ।
नन्ही परी सी बिटिया मेरी ।।


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14 thought on “बिटिया मेरी”
    1. बेटियां सदैव सम्मान और प्रेमपात्र होती हैं… आप ने बहुत सुंदर वर्णन किया है…उत्तम कविता ?

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