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तानी अपनी माँ मिताली को लेकर आज घर आ ही गयी । पिता डॉ बिश्वजीत रॉय की मृत्यु के बाद तानी के भाई भाभी यानी मिताली के बेटे बहु का व्यवहार उससे अच्छा न रहा।घर, जमीन सब तो पहले ही डॉ रॉय अपने बेटे के नाम लिख चुके थे पर बेटी के नाम पर खरीदा एक मात्र प्लॉट भी आखिरकार मिताली को अपने बेटे के नाम पर लिखना पड़ा।कारण अपने बेटे,बहु द्वारा बात-बात पर कलह,लड़ाई ।प्लॉट लिखने के बाद भी बेटे और विशेष कर बहु के मन में आदर के बीज नहीं बो पाई।
सुबह की चाय लेकर जब मिताली तानी के कमरे में गयी तो तानी चौंक कर उठी-“माँ, तुमने क्यों किया? मैं जाग चुकी थी।मैं बना लेती न।” हाथों से आंखों को मलते हुए तानी ने कहा।
“तो क्या हुआ अगर मैंने बना लिया।बेटा मैं तुझसे कुछ कहना चाहती थी।” सकुचाते हुए मिताली ने अपने मन की बात कही तो तानी ने अपनी माँ के नजरों में देखते हुए कहा-” बोलों न माँ क्या बात है?”
-“बेटा मैं वृन्दावन जाना चाहती हूँ । मेरे जीवन के जो बचे हुए दो-चार साल हैं , मैं प्रभु भजन में बिताना चाहती हूँ।” माँ के आवाज में एक विनती थी पर तानी माँ को अपने से दूर वृन्दावन नहीं जाने देना चाहती थी। पिता के मृत्यु के समय वो साथ नहीं थी पर माँ के अंतिम साँसों तक उनके साथ रहना चाहती थी, उनकी सेवा करना चाहती थी।विचलित आवाज में तानी ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा-“क्या माँ तुम भी!अभी तो आयी हो और कहीं जाने की जरूरत नहीं है तुम्हें ।यहाँ रहो और जितनी चाहे उतनी भजन करो।”
चाय का कप उठा कर तानी रसोई में चली गई पर बेचैनी को दबा नहीं पाई।पिता से दूर होने के बाद अब माँ से दूर नहीं होना चाहती थी।बात आई-गई हो गई।उस दिन के बाद न तो फिर कभी मिताली ने वृन्दावन का नाम लिया और न ही कही और जाने का ज़िक्र ही तानी से किया।मिताली अपनी बेटी का दिल नहीं दुखाना चाहती थी ।उसके लिए उसकी बेटी और बेटा दोनों तानी ही थी।तानी का पति भी अपनी सासु माँ से बस ठीक-ठाक व्यवहार करता था। मिताली के बहु बेटे ने न कभी अपनी माँ की खोज खबर ली न कभी तानी को ही फ़ोन किया।
उस रात मिताली को प्यास लगी।कमरे से बाहर किचन की ओर जाने लगी पर पैर तानी को कमरे के पास ठिठक गए।
-“तानी…..यार तुम समझ क्यों नहीं रही हो।मम्मी जी ओल्ड ऐज होम में रहेगी तो इसका मतलब ये नहीं कि हम से रिश्ता नाता टूट जाएगा उनका।वो तो बस….” समझाने के लहजे में तानी के पति सुमंत ने कहा। -“नहीं कुछ नहीं सुनना है मुझे और सुमंत तुम तो ऐसे नही थे।दादा के बाद अब तुम भी?” लगभग धिक्कार वाले आवाज में तानी ने कहा। -” हाँ तो क्या करूँ?तुम्हारी माँ को अपने सिर पर बैठाऊँ? तुम्हारे भाई ने तो अपने सिर से बोझ उतार फेका हमारे सिर पर।और अगर मैं ऐसा सोच रहा हूँ तो उनका भी भला है इसमें।अपने उम्र के लोगों के बीच रहेंगी तो मन भी लगेगा।हम दोनों को अपने काम से छुट्टी कम मिलती है।”
अगली सुबह तानी माँ के लिए चाय बनाकर उनके कमरे में गयी ।उन्हें कमरे में नहीं देखा तो सोचा आस पास कहीं होंगी।आधे घण्टे बाद भी जब माँ घर नहीं लौटी तो वह परेशान होने लगी।पास पड़ोस में भी पूछ लिया,पास के मंदिर में भी देख आयी।आखिर में तानी ने अपने भाई को भी फोन लगाया तो उन्होंने अपनी महानता और मातृ भक्ति बघारना शुरू कर दिया।
रोते रोते तानी के आंख सूज गए।सुमंत लगातार फोन पर बात किये जा रहे थे। अचानक तानी को मां के वृन्दावन जाने की इच्छा याद आयी।उसने सुमंत को बताया तो सुमंत ने झटपट वृन्दावन की टिकटे बुक कर दी।
रात को ही ट्रेन वृन्दावन स्टेशन पहुंची।सुमंत और तानी लॉज में ठहरे।तय हुआ अगले दिन सुबह ही माँ का पता लगाने के लिए निकलेंगे। अगले दिन सुबह सात बजे तक सुमंत और तानी लॉज के बाहर सड़को पर निकले तो वहाँ का नजारा देखकर हैरान रह गए।सड़क के दोनों किनारों पर बूढ़ी विधवाएं हाथ में कटोरा और कंधे पे झोला लटकाये भीख मांग रही थीं।हाथ फैलाये याचना करते हुए कभी उन्हें पैसे,रोटी ,चावल मिलते तो कभी उन्हें घुड़की भी मिलती। पर ये हाल सड़कों का ही नहीं मंदिरों,गलियों का भी था।पसीने से तर बतर,आंखों पर मोटा चश्मा सफेद साड़ी में लिपटी वृद्धाएं यहाँ इतनी ज्यादा संख्या में दिखी कि तानी का कलेजा फट पड़ा।उसके जी में आया कि चीखे-चिल्लाये, धिक्कारे उन सभी लोगों को जिन्होंने अपनी माँ को इस हालत में रख छोड़ा है।जिस उम्र में अपनों के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है उस उम्र में सड़कों पर दर-दर भटकने के लिए छोड़ जाते हैं।
तानी कई संस्थाओं के ऑफिस गयी जहाँ ये वृद्ध महिलाएं रहती हैं और बाकी बची जिंदगी बिताती है।रात को दोनों निराश-हताश थकी लॉज पहुंचे।सुमंत खाना लेने केंटीन चले गए।अकेली बैठी तानी को मातृ वृद्धा आश्रम की स्नेहा जी की बातें याद आ गयी-“तानी जी ,एक माँ अपने सारे बच्चों को अकेले पाल लेती है पर सारे बच्चे मिलकर भी एक माँ को नहीं रख पाते।”तानी के गाल भींग गए।
पंद्रह दिन वृन्दावन में भटकने के बाद भी जब मिताली नहीं मिली तो तानी और सुमंत घर आ गए।सुमंत ने मिताली के लापता होने की खबर पुलिस में दे दी पर कई महीने बीतने के बाद भी कोई खबर नहीं मिली।
सुबह की चाय लेकर तानी अखबार पढ़ रही थी तभी अचानक एक खबर पर उसकी नजर अटक गई।
‘एक बस के धक्के से एक वृद्धा की मौत हो गयी।सूत्रों से पता चला है कि वृद्धा का नाम मिताली रॉय है।वृन्दावन के सड़कों पर भीख मांगते हुए सामने से आ रही बस से धक्का लगने पर वृद्धा की मौत मौके पर ही हो गयी।’
तानी के आंखों के सामने वृन्दावन का दृश्य घूमने लगा।कानों में मंदिर की घंटियां बजने लगी और गूंजने लगा –
“हरे राम हरे राम,राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।”


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SWATI

By SWATI PUNAM MISHRA

Living both dimensions of life lively....both in theology and jolliness..

15 thought on “वृन्दावन”
  1. बहुत अछी कहानी।बहुत खूब।ऐसी ही कहानियों से समाज मे एक सकारात्मक भावना आएगी।

    1. एक अच्छी माँ तो हर एक बेटे के पास होती है, पर एक अच्छा बेटा हर एक माँ के पास नहीं होता!

      पता नहीं क्या जादू है, मेरी माॅं के पैरों में जितना झुकता हॅू, उतना ही ऊपर जाता हॅू!

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