सुबह कुछ कपड़ें फिंच कर क्लास करने के लिए विभाग के लिए निकला। जैसे ही निकला बारिश शुरू हो गई। फिर वापस रूम में आकर रेनकोट पहन कर साइकिल लेकर निकला। पहले मैं हेल्थ सेंटर गया। वहां से मैंने अपना हेल्थ कार्ड लिया जो मैंने बनवाने के लिए दिया था। फिर विभाग चला गया। विभाग में जाकर रेनकोट उतार कर मैंने खिड़की की एक लोहे पर टांग दिया ताकि पानी गड़ जाए उसमें से। मैं बेंच पर बैठा ही था कि दूसरे सेक्शंस में क्लास के लिए लिंक आ गई। किंतु मेरे सेक्शन (अ) में लिंक नहीं आई। 10 मिनट देखने के बाद मैंने एक मित्र से कहा कि चलिए ब सेक्शन में क्लास हो रही, वहां कर लिया जाए। जब हमलोग ब सेक्शन गए तो वहां भी सर् नहीं आएं थें बल्कि ऑनलाइन ही क्लास ले रहें थें। तो मैं फिर विभागीय लाइब्रेरी की ओर जा ही रहा था कि विंध्याचल सर् (डॉ• विंध्याचल यादव) मिल गएं।
मैं: प्रणाम सर्!
सर्: खुश रहो।(मुस्कुराते हुए सर् ने कहा)
सर्: अरे भाई सुनो, मेरी एक सहायता करोगे?(बड़े विनम्र भाव से सर् ने पूछा)
मैं: जी सर्, जरुर, आदेश कीजिए।
सर्: अरे आदेश वादेश की बात मत करो।
चलो मेरे साथ।
(फिर मैं सर् के साथ विभागीय लाइब्रेरी में गया, फिर सर् मुझे अपनी कार के पास ले गए जो उन्होंने लाइब्रेरी के बाहर पार्क की थी।)
सर्: मेरे पास कुछ शोध छात्रों के शोध हैं जिसे लाइब्रेरी में रखवाना है। थोड़ा सहायता कर दो उठा कर यहां ले आना बस। 8-10 होंगी आधे तुम ले लेना आधे मैं। दोनों जन उठा कर ले आते हैं।
(फिर बारिश तेज हो गई)
सर्: एक काम करो यहां से निकालेंगे तो वो सब भींग जायेगा। तुम लाइब्रेरी के अंदर से ही आगे आओ मैं कार लेकर वहां गेट पास आता हूं। वहां उतार लेना फिर हम दोनों साथ में ले आयेंगे।
मैं: जी सर्
(सर् कार लेकर गेट की तरफ गएं और मैं भी अंदर ही अंदर गेट के पास गया। फिर कार से मैंने सारे शोध पुस्तकें उतार कर सीढ़ी के पास वाली सुखी जगह पर रख दी। फिर सर् गाड़ी पार्क करके आते हैं और
आधी पुस्तकें वे उठाते हैं और आधी मैं। फिर मैं उनके पीछे-पीछे लाइब्रेरी में चला जाता हूं।)
सर्(लाइब्रेरी इंचार्ज से): इन सभी शोधों को आप लाइब्रेरी में रखवा दीजिए अवधेश प्रधान सर् ने ये भेजा है।
लाइब्रेरी इंचार्ज: अवधेश सर् को धन्यवाद दीजिएगा सर् और लाने के लिए आपको भी धन्यवाद।
(फिर मैं सर् के साथ विभाग के बाहर आ गया)
मैं (सर् के साथ चलते-चलते): सर् अवधेश सर् का घर कहां है?
सर्: अरे मेरे घर के बगल में ही सर् रहते हैं।
मैं: सर् तब मुझे कभी सर् से मिलवा दीजिए। मेरे एक सर् की PhD अवधेश सर् के अंदर है तो उन्होंने कहा था कि जब भी जाओगे BHU तो अवधेश सर् से आशीर्वाद जरुर लेना।
सर्: कौन हैं तुम्हारे सर्?
मैं: प्रोफ़ेसर रविरंजन सिंह सर्।
सर्: ओ, सर् को तो जनता हूं। अवधेश सर् के ही शिष्य हैं वे।
मैं: जी सर्, तो कृपया मुझे अवधेश सर् से एक बार मिलवा दीजिएगा।
सर्: अरे मैं आज ही तुम्हें मिलवा देता हूं। चलो आज उनका एक सेमिनार है दिनकर पर, कामधेनु ऑडिटोरियम में। बैठो कार में चलो उनको सुन भी लेना और मिल भी लेना।
मैं: बहुत-बहुत धन्यवाद सर्।
(फिर बारिश से बचते बचाते मैं सर् के साथ उनकी कार में बैठ कर कामधेनु ऑडिटोरियम में अवधेश सर् को सुनने के लिए निकला।)
सर् का भी उस तरफ जाना संभवतः प्रथम बार या कई दिनों बाद जाना हुआ इसलिए रास्ते में हमें दो-चार लोगों से पूछना पड़ा और थोड़ी देर भटकने के बाद हमलोग ऑडिटोरियम पहुंच गए। भटकाव का आलम ये रहा कि हम लोग एक बार उस ऑडिटोरियम के पास जाकर मुड़ गएं क्यूंकि गार्ड साहब ने कह दिया कि यहां कार्यक्रम नहीं हो रहा। अंततोगत्वा हमलोग हॉल में पहुंचे, और हमारे पहुंचने से पहले केवल औपचारिक कार्यकलाप संपन्न हुए थें और प्रस्तावना भाषण माननीय संयोजक प्रो• महेंद्र कुमार सिंह जी देना शुरू ही किए थें।(मैंने मन ने सोचा चलो एकदम सही समय पर पहुंचा हूं। अब केवल काम की बातें सुनने को मिलेंगी।) प्रस्तावना भाषण के बाद कार्यक्रम ने गति पकड़ी। कार्यक्रम हाइब्रिड मोड (ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों) में हो रहा था। संगोष्ठी में 3 वक्ता थें – डॉ• आनंदवर्द्धन(BBAU, Delhi), डॉ• कृष्ण कुमार सिंह (MGAHV, Wardha), श्री कुमार निर्मलेंदु (साहित्यकार, गाजीपुर) और अध्यक्ष थें अवधेश प्रधान सर्। आनंदवर्द्धन जी और कृष्ण सिंह जी ऑनलाइन जुड़ें थें, निर्मलेंदु जी सशरीर मौजूद थें। क्रमवार वक्ताओं को मंच दिया गया और सभी ने अपनी अपनी बात रखी। मैं चुपचाप सभी वक्ताओं को सुनता रहा, यही मेरा धर्म था, बाकी सहमति-असहमति अपनी जगह। और मैं कौन होता हूं असहमति जताने वाला इसके लिए अध्यक्ष साहब थें, जिनके भाषण में सर्ववस्तु का निचोड़ था। मैं निश्चित रूप से जिन्हें देखने और सुनने के लिए मैं गया था उन्हें मैंने पहले सुना फिर देखा। लगभग 40 मिनट्स तक सर् ने अपनी बात रखी, फिर समय का ध्यान रखते हुए संबोधन को संक्षेप में विराम दिया। एक विशेष बात कहना चाहूंगा कि जिनके प्रति हमारे मन में विशेष आदर भाव होता है उनकी एक-एक हरकत पर हम नजर बनाएं रखते हैं। मैं भी आज यही कर रहा था। मैं अवधेश सर् को एकटक देख रहा हाथ और उनकी आंगिक प्रतिक्रियाओं से ही मैं वक्ताओं की गुणवत्ता को परखने का प्रयास कर रहा था। अवधेश सर् किसी की बात कर कभी हल्का-सा मुस्कुराते तो कभी किसी की बात को एक कागज पर नोट करते, बकायदा निर्मलेंदु जी के भाषण पर सर् ने खुद सबसे पहले ताली बजाई। इस प्रकार मैं उस अपरिचित स्थान पर सबका परिचय पा रहा था। अंत में धन्यवाद ज्ञापन की औपचारिकता के पश्चात नाश्ता की व्यवस्था थी जिसका आनंद सभी ने उठाया।
सारे कार्यकलाप की पूर्ण समाप्ति के बाद जब प्रस्थान का समय आया तब विंध्याचल सर् ने अवधेश सर् से कहा कि आप किन्हीं और के साथ नहीं जाइएगा, मैं आपको अपने साथ ले चलूंगा। फिर अवधेश सर् ने बड़े प्रेम से विंध्याचल सर् का परिचय खुद वहां के अतिथियों को दिया और सबसे परिचय करवाया। फिर जब हमलोग नीचे उतरे तब विंध्याचल सर् ने कहा कि अजय तुम सर् को लेकर आओ मैं कार निकलता हूं।
मैं (अवधेश सर् से): प्रणाम सर्!
अवधेश सर्: प्रणाम (बड़ी विनम्रता से)
मैं: सर् मैं रविरंजन सर् का शिष्य हूं।
अवधेश सर्: अच्छा! तो आप घाटशीला से हैं?
मैं: नहीं सर् मैं तो पश्चिम बंगाल से हूं। रविरंजन सर् से मेरी गुरु-शिष्य समान संबंध हैं। अध्ययन में मुझे कोई समस्या होती है तो मैं सर् को कॉल करता हूं और सर् मेरी सहायता भी करते हैं। उन्होंने ही कहा था कि BHU जाऊं तो आपसे जरुर मिलूं।
अवधेश सर्: अच्छा है। तब आप बंगाल में कहां से हैं?
मैं: सर् आसनसोल से हूं।
अवधेश सर्: ओ, तो क्या आप पर्टिकुलर आसनसोल शहर से हैं?
मैं: नहीं सर्, कुल्टी से हूं मैं, संजीव जी के शहर से।
अवधेश सर्: अरे वाह! वाह! संजीव जी के क्षेत्र से आप हैं। तब आप सहयोग वाले में गए होंगे?
मैं: जी सर् दोनों दिन गया था कार्यक्रम में।
विंध्याचल सर्: सर् ये अजय है। आपके शिष्य का शिष्य। आपसे मिलना चाहता था तो मैंने कहा चलो सर् को सुन भी लेना फिर मिल भी लेना।
अवधेश सर्: हां, ये वही बता रहें।
अवधेश सर्: वाह! बहुत अच्छा। दरअसल मुझे भी जाने की उधर इच्छा थी किंतु अब उमर हो चला है ऊपर से ये महामारी!
मैं: जी सर्, इस अवस्था में रिस्क लेना उचित नहीं होगा।
अवधेश सर्: जी हां। आपका नाम क्या है?
मैं: सर् अजय कुमार साव। (इसलिए मैंने ऊपर लिखा है कि पहले मैंने सर् को सुना और बाद में मेरा उनसे मिलना हुआ।)
फिर विंध्याचल सर् कार लेकर आ गएं। और सर् अगली सीट पर बैठे सर् के साथ और मैं पीछे पैसेंजर सीट पर। फिर विंध्याचल सर् मुझे विभाग तक छोड़ आएँ और फिर सर् के साथ घर की ओर चले गएं।
अंत में शाम 4:30 बजे तक मैं अपने रूम पर आया फिर फ्रेश होकर संस्कृति के चार अध्याय पढ़ने बैठ गया।


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