भारत जिसे हम पर्वों का देश कहा जाता है, जहां हर दस दिन पर कहीं ना कहीं एक पर्व मनाई जाती हैं, वहां एक ऐसा पर्व भी मनाया जाता है जहां हम खुशियां मनाएं, मस्ती करें, थोड़ा शो ऑफ करे और तो और थोड़ा सा बेइज्जती भी कहे – त्यौहार हैं परिणामों का।

 

हर जगह लोग एक दूसरे को बधाइयां देते फिरते हैं, तो उत्तीर्ण हुआ उस सर आंखों पर बैठा लेते है, जश्न मनाया जाता है। और कहीं ना कहीं जो उत्तीर्ण ना हो पाए, अच्छे अंक न ला पाए उसपे क्रोध, उससे किनारा करने की कोशिश, उसकी बेज्जती करने की कोशिश की जाती हैं, भारत में जातिवाद और धर्मवाद के अलावा कोई बड़ी समस्या हैं तो वह हैं – परिणामों के भेदभाव का, अच्छे अंक लाने वालों को जितना प्रोत्साहन मिलता हैं, बुरे अंक लाने वाले को उतनी को जादती झेलनी पड़ती हैं। यहां पर यह समझ नहीं आता कि आखिर ज्ञान को हम परीक्षा के परिणाम से जोड़कर क्यों देखते हैं। कौन कितना ज्ञानवान हैं और कौन नहीं ये परीक्षा का परिणाम पत्र तो नहीं बता सकता ना। वह तो बस इतना बता सकता है कि कौन कितना रट सकता हैं और कितना नहीं ।

 

एक तरफ तो जो लोग अपनी सफलता ( परीक्षा में उत्तीर्ण होने ), की उत्सव मानते हैं तो वहीं दूसरी ओर वह लोग परिणामों को लेकर पूछे गए प्रश्नों से दूर भी भागते हैं। चाहे वह काम कि जगह हो, चाय की दुकान हो, संध्या वार्ता हो, मीटिंग हो लगभग हर जगह सिर्फ और सिर्फ परिणामों की ही चर्चा होती हैं कि फलाना का बेटा फर्स्ट आया तो फलाना का बेटा फेल हो गया। तो यहां पर एक प्रश्न उठती हैं कि आखिर क्यों, बच्चो की परीक्षा परिणाम के लिए इतना कौतूहल क्यों ? अंक तो सिर्फ यह दर्शाती हैं कि कौन बच्चा अपने एकेडमिक्स में कितना फोकस रहा। जो बच्चे अच्छे अंक ला पाए हो, हो सके वह किसी और कार्य में श्रेष्ठ हो, जैसे – खेल, गायका, कलाकारी इत्यादि… जहा पर शायद उन्हें अच्छे से नहीं समझा गया हो। हमारे भारतीय समाज में सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक महत्व किसी के परीक्षा परिणाम के आधार पर की आंका जाता हैं। और एक परीक्षा परिणाम माता पिता को सामाजिक मजबूती में भी योगदान देती हैं।

 

जब भारत में हमेशा से लाखों बेरोजगार हो, नौकरियां ना मिल रही हो, उसके लिए जगह भी कम पर रहीं हो। फिर भी हम प्रतिभा को नहीं परिणाम को देखते हैं । एक वैश्विक आर्थिक सिद्धांत है – ” जब जब मांग तेजी से बढ़ती हैं, तब तब आपूर्ति भी उतनी ही तेजी से घटती हैं।” यह हमे यह भी दर्शाती हैं कि कुछ ही लोग अपनी जरूरतों को, अपने सपनों को पूर्ण कर पाते हैं। और यह उच्च स्तरीय लोगों में लालच पैदा करती हैं, उन्हें हीन बनती हैं। ” उनका कहना है कि यदि तुम मुझे अच्छा नहीं दोगे, तो मैं सारा के लूंगा।”

 

यह ज़रूरी की यह भावना सिर्फ बड़े लोग ही देते हो, जैसे – शिक्षक, मा – बाप ऐसा नहीं है, यह भावना तो विद्यार्थी में खुद उर्जित होती हैं, एक दूसरे को देख कर की अच्छे अंक लाने से ही बुद्धिमान कहलायेंगे, लोग उन्हें तबैजू देंगे। हम भारतीय कुछ अलग करने से, कुछ हट कर करने से कहीं ना कहीं डरते हैं, कार्य से पहले ही फल की चिंता करने लगते हैं, यदि नहीं हो पाया तो फिर क्या करूंगा। उन्हें पढ़ाई, अच्छी नौकरी, शादी और एक व्यवस्थित जीवन चाहिए, वह ना तो कुछ अलग, कुछ experimental करने , की कोशिश करते हैं और ना ही करते हैं, जितना मिला उतना ने ही खुश हो जाते हैं। वह स्कूल ही इसीलिए जाते है ताकि अच्छे अंक प्राप्त कर सके, जिससे उन्हें बड़ी तनख्वाह वाली नौकरी और आराम मिल सके।

 

ऑस्कर वाइल्ड ने एक बार कहा था , ” सब चीजों की कीमत का ज्ञान होते हुए भी हम उसे उतनी महत्व नहीं देते।”

 

 


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Ravindra AshwinRanjan Kumar

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