दायरे से शुरू, दायरे पर खत्म ,
लड़कियों की जिंदगी होती है ,
हां ये वही बेटियां हैं जनाब
जो अक्सर रातों को छिपकर रोती है ।

अगली सुबह उठकर सब की जिंदगी में,
खुशियों के रंग बिखेरती हैं।
मन‌ की‌‌ बात अक्सर सब से छुपाती है,
किसी को मेरी बात से तकलीफ ना हो
इसलिए हमेशा अपने ही मन को समझाती हैं ।

बचपन से ही सभी उन्हें दायरे में रहना सिखाते हैं,
हां ये वही परियां है , जिनके पंख कटे जाते हैं।
ना जाने जमाने के तानों की खातिर ,
कितनी अवसरों से रोकी जाती ‌है।
अक्सर उन्हें लोग पापा की परियां कह कर चिड़ाते है,
उन्हीं परियों को लोग कभी कचड़े के डिब्बे,कभी नाले ,
तो कभी आग में झोंक जलाते हैं ।

कभी इनके रंग, रूप, आकार को देखकर नीचा दिखाते हैं लोग
फिर भी इन्हीं पर अपनी गंदी नज़रें सेंका करते हैं लोग।
जमाने ‌के साथ चले ,ना चले पर
बचपन से ही मां उन्हें दायरे का महत्व समझाती है
मेरी बेटी पर कोई बुरी नजर ना रखें इसलिए
ढंग से कपड़े पहनना सिखाती है ।
इसलिए लड़कियों को ही हर वक्त जमाने से छुपाती है ।

यूं तो कई किरदारों में देखा होगा आपने
कभी बेटी, कभी मां, कभी बहू, कभी बहन, कह कर पुकारा होगा आपने,
फिर भी इनकी कोई पहचान नहीं होती।
जितनी सादगी भरी होती है ये ,उतनी भी जिंदगी इनकी आसान नहीं होती।

अपने ही अस्तित्व की तलाश में कही गुम सी हो जाती है ,
कभी पराये घर की है, कभी पराये घर से आई है।
ये सम्बोधन हर रोज चुप चाप सहती है,
फिर भी उन्हीं लोगों की खुशी में ,अपनी जिंदगी खोती हैं ।

एक नया रिश्ता निभाने के लिए,
कई पुराने रिश्ते छोड़ जाती है।
फिर एक समय ऐसा भी आता है,
नये , पुराने दोनों ही रिश्ते  में अकेली खड़ी नज़र आती हैं।
अपने मन को मारना बखुब ही जानती है,
और उस दर्द में ही अपनी पुरी जिंदगी जी जाती है ।

दायरों में भी सिमट कर खुशी की वजह ढूंढा करती है,
कभी बिना बात ही रोती है तो कभी,
बेफिजूल की बातों पर ठहाके की हंसी लिया करती हैं ।
आंखों के आंसु सब से छुपाती है,
जो दिख जाए गलती से ,तो कुछ चला गया आंखों में ये बहाना बनाती हैं।

कभी उनके भी मन को पढ़ लिया करो,
कुछ ज्यादा नहीं ,बस तुम भी उनकी छोटी-छोटी
खुशियों की खातिर जिया करो।
तुम समझौता करते हो
वो रिश्ते दिल से निभाती है ।
मन ना भी मिले पर कभी जताती नहीं
तुम्हारी ही जीत हो इसलिए अक्सर हार जाती है,
फिर भी ना जाने क्यूं कोने में अकेली नज़र आती हैं ।

अपने सपनों का महल ये भी बचपन से सजाती हैं,
फिर उन्हीं सपनों को कभी पिता, कभी मां, कभी पति ,कभी भाई, बहन की खातिर एक एक कर छोड़ जाती है ।
दायरे से शुरू दायरे पर खत्म ,
ज़िंदगी भर जीना आसान नहीं होता,
जमाने की नज़रों में इनका कोई स्वाभीमान नहीं होता ।


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SAHUNeha
Neha

By Neha

10 thought on “दायरों वाली परियां”

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