मैं कॉलेज से आज जब घर आई तो पसीने से तरबतर मां के चेहरे पर हड़बड़ाहट के साथ एक मुस्कुराहट ने मुझे हैरान कर दिया।पूछने पर पता चला कि कल मुझे लड़के वाले देखने आ रहे हैं।यह मेरे लिए पहली बार नहीं बल्कि इससे पहले भी कई बार मुझे देखने वाले आये थे,पर कभी दहेज और कभी रंगत के आगे कभी बात बढ़ी ही नहीं।पर माँ को पूरा भरोसा था कि इस बार रिश्ता पक्का हो जाएगा।
मेरा साँवला रंग पिछले हर रिश्ते में अटकाव का कारण रहा पर इस रिश्ते में न दहेज की कोई विशेष मांग थी और न ही मेरा सांवला रंग ही लड़के वालों को खटका।कारण था लड़के का दोहाजु होना।इस रिश्ते से मुझे कोई तकलीफ़ न थी क्योंकि मेरे अलावा भी इस घर में और लोग थे।हमने बचपन से ही बेबसी और लाचारी में जीवन जीना तो मानो सीख लिया था।
सीधे-सादे ढंग से हमारी शादी हो गयी।मेरे पति में अनिरुद्ध साह एक जाने-माने बैंक में मैनेजर थे।ससुराल में मेरा स्वागत बहुत अच्छे से हुआ।सारे नेग-रश्म पूरे हुए और जब मैं अपने कमरे में आराम करने लगी तभी एक आवाज सुनाई दी-“आप मेरी नई माँ हैं? आवाज एक आठ-नौ साल के बच्चे की थी।उसे देखते ही मुझे अपने छोटे भाई पीनु की याद आ गयी।मैने उसे प्यार से अपने पास बुलाया और सकुचाते हिचकते हुए वो मेरे पास आ गया पर अब भी वो मुझसे दूर ही था।मैंने उसका हाथ पकड़ के अपनी ओर खींचा और अपनी गोद में बिठा लिया।
-“आपका नाम क्या है?”
-“हम आरव साह हैं।पर आपने हमें बताया नहीं.. आप हमारी नई माँ हैं?
मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी
-“मैं आपकी माँ हूँ, नई माँ नहीं।”
मैं अभी उससे और बातें करना चाहती थी पर किसी की आवाज ने हम दोनों को ही चौंका दिया।
-“यहाँ क्या कर रहे हो तुम?जाओ अपने कमरे में।दादी माँ तुम्हें ढूंढ़ रही हैं।”अनिरुद्ध थें।आरव सिर नीचे किए चुपचाप कमरे से निकल गया।उसके जाते ही मुझे पीनु और घरवालों की याद फिर से आने लगी पर सन्तोष था कि यहाँ कोई तो है मेरा अपना।
मेरे पति मुझसे 15 साल बड़े थे जाने क्या बात थी कि उन्हें मेरा और आरव का घुलना मिलना पसन्द नहीं था।उनके ऑफिस जाने पर ही मैं और आरव बात कर पाते,हंसते ,खेलते पर उनके आते ही घर में घुटन का माहौल बन जाता,घर में मुझे अकेलेपन का एहसास होने लगता।न जाने क्यों वो मुझसे आरव को दूर रखना चाहते थे।
उस दिन आरव के स्कूल में छुट्टी थी।अनिरुद्ध के ऑफिस जाते ही आरव खेलकूद में लग गया था।
-“ध्यान से आरव….खेलो लेकिन सम्भल के।”
-“हाँ माँ।”
यही कोई 10-15 मिनट हुए होंगे कि एक चीख ने मुझे सकते में डाल दिया।किचन से बाहर निकली फर्श पर खून से लथपथ औंधे मुंह बेहोश पड़े आरव को देखकर मेरे होश उड़ गए।आनन-फानन में मैंने अनिरुद्ध को कॉल किया।
-“बोलो क्या हुआ।”धीमे पर तीखे आवाज़ में अनिरुद्ध बोले।
-“वो….वो आरव छत से गिर पड़े हैं।आप जल्दी घर आ जाइये।
-“आरव?तुमसे एक काम नहीं सम्भलता।”और कॉल कट गया।अनिरुद्ध आये और आरव को लेकर हम हॉस्पिटल गए।डॉक्टर आरव को ऑपरेशन थिएटर में ले गए।हॉस्पिटल में अनिरुद्ध कोई तमाशा नहीं चाहते थे शायद इसलिए उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा। डॉक्टर बाहर आये।
-“बच्चे को गहरी चोट आयी है और खून भी ज्यादा बह गया है। आप एक काम कीजिए दो यूनिट ब्लड का अरेंजमेंट कीजिए। इट्स वेरी अर्जेंट. थोड़ा जल्दी।ओके?”
-“जी डॉक्टर।”
डॉक्टर की बात सुनकर परेशान अनिरुद्ध आग बरसाती आंखों से घूरते हुए मुझसे कहा -“आखिर दिखा ही दिया तुमने अपना रंग।इसीलिए इस शादी के विरोध में था मैं।तुम तो उसकी अपनी कभी थी ही नहीं।यही कारण था कि मैं उसे तुमसे दूर रखना चाहता था।सौतेली माँ कभी अपनी नहीं हो सकती।”
ये शब्द मुझे अंदर से तार-तार कर चुके थे।अनिरुद्ध इन सबका का जिम्मेदार मुझे मैसन रहे थे।मेरी चेतनाशून्य आंखें अनिरुद्ध को जाते हुए देख रही थी।इतना बड़ा लाँछन।मैं अब यहाँ नहीं रह सकती थी ।मैंने सोच लिया था आरव की छुट्टी होते ही माँ के पास चली जाऊँगी।
काफी देर बाद अनिरुद्ध दो यूनिट ब्लड लिए आये।डॉक्टर ने उन्हें देखते ही कहा-“मिस्टर साह आपने देर कर दी।अब इसकी कोई जरूरत नहीं।आपने बताया नहीं आपकी पत्नी और बच्चे का ब्लड ग्रुप एक ही है।मिसेज साह ने काफी मदद की। आरव अब खतरे से बाहर है।”
आरव अब होश में था।मैं कमरे से बाहर जाने लगी। आरव बस इतना बोला-“मम्मी।” उसकी मर्मरी आवाज इसके आगे कुछ न बोल पायी।मैं उसके पास नहीं गयी बस दूर से उसे एक बार प्यार से देखा । बाहर जाने लगी तभी अनिरुद्ध की आवाज ने मुझे रोक लिया।
-“रुक जाओ प्रभा।मैं बोहोत गलत था।मुझे माफ़ कर दो।मैं तुम्हे समझ नहीं पाया।रुक जाओ…..मेरे लिए न सही अपने बच्चे के लिए ।अपने बेटे आरव के लिए।”


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PAYALHimanshu MishraSAHU
SWATI

By SWATI

Living both dimensions of life lively....both in theology and jolliness..

8 thought on “रुक जाओ प्रभा”
  1. हमेशा की तरह अतुलनीय। ऐसा कभी लगता ही नही के कोई कहानी पढ़ रहा हूँ। यही लगता है कि सब कुछ मेरे सामने घटित हो रहा है। बहुत खूब।

  2. बहुत अच्छी कहानी ऐसे ही लिखते रहो बहुत अच्छा लगता है पढ़ कर । तुम्हारा उपन्यास बहुत जल्द छपेगा

  3. सच मे! जब भी हम आपके लिखी कहानी पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि हम कहानी देख रहे हैं… कहानी भी लाजवाब है और विषय भी।👌

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