कीचड़ लगा हो जब तन पर ,

उसको करते  नही हो पसंद ।।

गंदगी भरी हो मन में जब ,

उसको दूर करने का करते नही प्रयत्न ।।

व्याप्त हो गई है बुराई समग्र संसार में ,

छा चुका है हर तरफ बादल नफरतों के।।

अलग हो गया है मानव – मानव से

उदारता की भावना दूर हो गया इंसान से ।।

देख कर कष्ट आज – कल  किसी का ,

दिल नहीं पिघलता मनुष्य का ।।

अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ,

दूसरों का अहित कर डालते।।

केवल अपनी छोटी  सी आकांक्षा के लिए ,

दूसरों को नुक्सान पहुंचाने से नहीं कतराते ।।

धर्म मानव का बस इतना है,

दो मीठे बोल कर राज ह्रदय पे करना है।।

पर आज कल लोग मुंह पर देते है शाबाशी ,

पीठ पीछे करते है बस एक दूसरे की बदनामी ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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Simran

By Simran

अंधेरे में अकेले ही अपने कदमों को आगे बढ़ाना पड़ता है....वरना उजाले का क्या है इसमें सैकड़ों आ जाते है हाथ थामने के लिए ।।

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