• 4 साल बाद धर्मेश अपने गांव पहुंचा। गाड़ी की सायरन की आवाज थमते ही उसकी जगह बैंड बाजे की शोर ने ले ली।ऐसा लग रहा है मानो सारा गांव उसके दरवाजे पे खड़ा है।बाजे के धुन पर बेतहाशा नाचते-कूदते बच्चे किशोर दांत निपोरते युवा, खास करके भाभियां, वाहवाही करते बुजुर्ग। पर इन सबसे धर्मेश को लेना देना नहीं है, उसकी नजरें तो टिकी है उसकी अम्मा, बाऊजी और छुटकी पर।बाऊजी अपनी भावनाओं को दबाए मुखिया जी के साथ खड़े हैं क्योंकि उनका मानना है कि समझदारी इसी में है कि दुख में ना धैर्य खोए और सुख में अति उत्साही ना बने।इतने पर भी उनकी आंखों की चमक और चेहरे का गर्व छिपाए नहीं छिप रहा था।दूसरी तरफ छुटकी और मां के चेहरे की जियोग्राफी अलग थी।आंखों में गंगा यमुना और चेहरे पर दांतो के साथ-साथ जबड़ों का भी प्रदर्शन करने वाला 180 डिग्री की स्माइल।देखकर लगा,धर्मेश भी रो पड़ेगा।
    पिछले कार से उतरकर गनमैन में कार का दरवाजा खोलकर कहा-” अबे धर्मेश…8:30 बज गए बे।”धर्मेश की त्यौरियां चढ़ गई।इस गनमैन की इतनी हिम्मत! तभी गनमैन में उसके बांह पकड़ के जोर से झिंझोड़ा।धर्मेश की आंखें खुल गई,देखा तो वह अपने 6 बाई 6 की बिखरे, किताबों से भरे पड़े कमरे में खाट पर सोया है और सामने सतीश मुंह में ब्रश घुसेड़े खड़ा है। धर्मेश के जी में आया खूब खरी-खोटी सुनाए। इतनी खराब टाइमिंग? थोड़ी देर रुक नहीं सकता था। मां बाबूजी से मिल लेता, पर अब कहा भी क्या जाए।
    -“आज इतनी देर तक सोते रहे।देखो आज हम ने बाजी मार ली।”-मुंह का ब्रश निकालते हुए सतीश बोला।” हां ठीक तुम राजा बाबू बन गए।”-धर्मेश के जी में आया एक जोर का कंटाप लगाएं पर बेचारे ने आगे कुछ ना कहते हुए बाहर का रास्ता ले लिया।” अबे हम काहे का राजा बाबू …राजा बाबू तो तुम बनोगे।”मुंह का झाग थूकते हुए सतीश धर्मेश के पीछे हो लिया।
    सतीश की बातें धर्मेश चुपचाप सुने जा रहा था।धर्मेश शुरू से ऐसा नहीं था। हंसमुख, खुशमिजाजी, शायराना शब्द उस पर अच्छे लगते थे। सतीश के साथ ही गांव से इलाहाबाद आया था वह।दोनों ने कॉलेज में एक साथ दाखिला लिया और यहीं से दोनों की सपनों ने उड़ान भरी।सतीश जहां कॉलेज के छात्र संसद का अध्यक्ष बना, वही धर्मेश सिविल सर्विसेज की तैयारी में लगा रहा।पर सतीश को लगता है कि धर्मेश इतनी मेहनत बेकार कर रहा है।उसे कोई दूसरी नौकरी कर लेनी चाहिए पर अपने दोस्त का मनोबल बनाए रखने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता। पर हां, समय-समय पर छेड़ता जरूर है-“कितना भी पढ़ लो धरम रहोगे तो हमारे नीचे ही।हम बनेंगे सीएम और तुम रहना हमारे सलाहकार।” किसी तरह से हँसी रोकते हुए ढीठ की तरह सतीश कहता।”तुम ना ……नहीं सुधरोगे। आखिर क्या रखा है इस लीडरई में…. काजल की कोठरी…..।” फिर शुरू होता जीवन,कर्म,गौरव पर एक लंबा व्याख्यान। सतीश के लिए शायद यही उसकी लोरी थी।
    सतीश और धर्मेश अपनी पारी का इंतजार कर रहे थे।धर्मेश के लिए नया कुछ नहीं था।नया था तो बस यही कि इस बार वह अपनी फाइनल मेरिट का रिजल्ट देखने आया था।उसे उम्मीद थी कि इस बार वह सफल होगा ही।-” धरम, चलो चाय पी के आते हैं।पता नहीं पारी कब आए?तुमने सुबह से कुछ खाया भी नहीं था।”
    -“नहीं मैं पहले रिजल्ट देख लूंगा।”
    -“क्या यार धरम…यह क्या भीष्म प्रतिज्ञा है ?और यह साले अंदर जाकर सो जाते हैं क्या? रुको मैं बात करता हूं।”
    -” नहीं यार हमारी जब आएगी तब देख लेंगे।”
    -“चुप रहो तुम।चेहरा देखो अपना।बिना खाए-पीये आ गए।”
    कुछ ही मिनटों में सतीश और धर्मेश मॉनिटर स्क्रीन पर आंखें लगाए थे पर शायद अब सर्वर की बारी थी इंतजार कराने की। करीब बीसियों बार फॉर्मेट भर चुका था धर्मेश,पर हर बार फेल।अब तो सतीश का गला सूखने लगा था।-“धर्मेश मैं पानी लेकर आता हूँ।” कहकर सतीश कैफे से बाहर आ गया।उसे चिंता हो रही थी कि धर्मेश की क्या हालत होगी। मन ही मन उसने सारे देवी देवताओं को पुकारा।सब अच्छा हो।उसके दिमाग में गुणा-भाग चलने लगा।-“एग्जाम तो अच्छा दिया था धर्मेश ने। इंटरव्यू भी उसने बढ़िया ही दिया था।पर दो-तीन जगह पर अटक गया था।पर इससे क्या इतना तो सबके साथ होता है।हे प्रभु सहायता करो।”
    पानी का बोतल लेकर सतीश धर्मेश के पास गया पर यह क्या? धर्मेश कोहनी टेबल पर रखे हाथ पर सिर टिकाए एकटक स्क्रीन पर देखा जा रहा था।
    -“सतीश सब बर्बाद हो गया……सब…… सब कुछ खो दिया मैंने……।”धर्मेश की सांसे तेज चल रही थी।आंखें फटी हुई, हाव भाव पागलों से ।
    -“एक बार और देख ले धरम।हो सकता है कुछ गलती हो गई हो।” पर सतीश खुद को ही नहीं समझा पा रहा था।
    -“मैं देखता हूं ।ऐसा नहीं हो सकता यार।”पर नतीजा बदलने वाला तो नहीं ही था।
    आधे घंटे बाद सतीश और धर्मेश दोनों कमरे में थे।धर्मेश को देखकर सतीश को लग रहा था वह अपने साथ एक जिंदा लाश लिए आया है।
    -“धरम …ऐसे चुप मत हो भाई।बोल कुछ। मेरे पर अपना गुस्सा दुख जो भी हो, निकाल ले। बस ऐसे चुप मत रह।” सतीश को डर लग रहा था कि धर्मेश को कुछ हो ना जाए।
    “पता है धरम मुझे ना बहुत भूख लगी है…… तुम कुछ खाए नहीं तो सुबह से मैं भी कुछ नहीं खाया था।चलो ना चाय पी के आते हैं। छलछलाई आंखों से सतीश में धर्मेश का मन दूसरी ओर फेरना चाहा।
    -“हाँ… अ……वो…… मैं नहीं जाऊंगा… एक काम करो,तुम चले जाओ……मेरे लिए भी कुछ लेते आना.धर्मेश भर्राए गले से बोला। बहुत देर चुप रहने से आवाज टूट टूट कर निकल रहे थे।पर सतीश को ऐसा लगा उसका दोस्त कोमा से बाहर आ गया हो।’हां’ कह कर खुशी के मारे दौड़ता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।
    चुपचाप बैठे धर्मेश की नजर फोन पर गयी।करीब पचासों मिस्ड कॉल्स ,सौ से ज्यादा व्हाट्सएप मैसेज।सारे उसके कोचिंग इंस्टिट्यूट के साथी,सर और जान पहचान वालों के। सारे मैसेज लगभग वही पूछ रहे थे जो धर्मेश अपने जबान पर लाने से डर रहा था।इंस्टीट्यूट के ग्रुप में मैसेजों की भरमार थी।विवेक, पूजा,जस्सी, अहमद और उसकी जूनियर श्रुति को बधाई के मैसेज और हर मैसेज के साथ एक ही सवाल धर्मेश का क्या हुआ? तभी फोन वाइब्रेट होने लगा……’बाबूजी?’ …’क्या कहेगा ?वह तो उम्मीद में थे कि इस बार उनकी परेशानी खत्म हो जाएगी।पर उन्हें क्या पता,उनका नालायक बेटा फिर से फेल हो गया है।’
    इस बार धर्मेश खुद को रोने से रोक नहीं पाया।-“सब के दुख का कारण बना हुआ हूं।कुछ नहीं कर सकता मैं। ऐसी जिंदगी किस काम की?क्या खुशी दे रहा हूं? सब लोग बाबूजी को पूछेंगे और फिर बाद में बातें बनाएंगे तिवारी जी का लड़का फिर से फेल हो गया। पढ़ता क्या होगा शहर में?बाप के पैसों से मजे कर रहा है। मेरा रहना ना रहना बराबर है। मुझे मर ही जाना चाहिए।हां…… तुझे मर जाना चाहिए धर्मेश। बेकार सी हो गई है तेरी जिंदगी। बोझ बन गया है तू। रह ही रहे हैं ना तेरे बिना घर के लोग।……तू जिंदा रहा तो एक न एक दिन लोगों की बात सुनते सुनते हुए जरूर मर जाएंगे…।
    बड़बड़ाते हुए वह अपने कमरे का आधा सामान बिखेर चुका था।पर जो उसे चाहिए वह मिल नहीं रही थी। करीब 10 मिनट के बाद घर में शांति से अपनी पढ़ाई की कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ में चूहे मारने की दवा की वही शीशी थी,जिसे वह इतनी देर से खोज रहा था। उसके हाथ कांप रहे थे, चेहरा,ललाट पसीने से भरा था। सांसे बहुत धीमी चल रही थी।तभी मेज पर पड़ा फोन घनघनाया। “माँ”आंसू भरे हुए आंखों से भी वह साफ पढ़ सकता था। बात करें या नहीं इसी असमंजस में कॉल कट गया।क्या कहेगा वह तो यह परीक्षा रिजल्ट कुछ नहीं समझती। उसे तो बस अपने बेटे के घर वापस आने का इंतजार है।कॉल दूसरी बार भी आकर कट चुका था और धर्मेश अपनी चेतनाशून्य आंखों से देखता रहा। धर्मेश के दिमाग ने कहा-“एक आखिरी बार बात कर ले धर्मेश ।फिर उसकी आवाज नहीं सुन पाएगा।” धर्मेश आंसू पोछता हुआ कॉल लगाने लगा।तीन-चार रिंग के बाद कॉल उठा।
    -” हेलो”
    -“मां……”
    -” कहो कलेक्टर बाबू, घर कब आ रहे हो?”
    ‘कलेक्टर बाबू..?’ पहली बार मां ने उसे ऐसे पुकारा था। उसके हाथों में शीशी की पकड़ ढीली पड़ गई। सांसे तेज हो गई।-“यह सपना सिर्फ मेरा नहीं मां का भी है इतनी बड़ी गलती करने वाला था मैं?” दिमाग की कोई नस फड़कते हुए उसे जिंदा होने का एहसास करा रही थी।उसके आवाज की लड़खड़ाहट अब गायब हो चुकी थी।शांत और स्थिर आवाज में उसने बस इतना ही कहा-“अगले साल माँ…… अगले साल जरूर आएगा तेरा कलेक्टर बाबू।”

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Himanshu MishraSAHUPAYALSWATI
SWATI

By SWATI PUNAM MISHRA

Living both dimensions of life lively....both in theology and jolliness..

20 thought on “कलेक्टर बाबू”
  1. बहुत अच्छे मैम्म । अति सुन्दर ।।। Proud of you… Proud to have you as my teacher .. proud to being your student ..

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  2. बेहतरीन कहानी स्वाती,,,, मरती अभिलाषा में भी आशा की किरण दिखाने वाला हृदयस्पर्शी कहानी,,,, लिखते रहिए…. 👏👏👏👏
    आप जरूर पार करोगी अपनी हर बाधा…☝
    जल्द ही पूरा लक्ष्य जो आपने है साधा… 📝

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